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कैलादेवी के लक्खी मेले में उमड़ा जन सैलाब

उत्तर भारत का प्रमुख तीर्थ स्थल एवं दूसरा महाकुंभ कहे जाने वाला कैलामाता का वार्षिक लक्खी मेला 19 मार्च से शुरू हुआ और 4 अप्रेल तक चलेगा। प्रथम दिन से लेकर अष्टमी तक मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में ढोक लगाई एवं मन्नत मांगी। मेले में करीब 40 लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। पदयात्रियों के लिए भंडारे लगाये गए। जहां निशुल्क भोजन, नाश्ता, फल, फास्टफूड, दूध, ठंडाई, विस्किट के अलावा ठहरने, आराम करने एवं चिकित्सा के पूरे प्रबंध किए गए। मेले में पुलिस व प्रशासन ने भी पुख्ता व्यवस्थाऐं की हैं। 1449 पुलिसकर्मियों को सुरक्षा के लिए तैनात किया है, 250 से अधिक सीसीटीवी कैमरों से हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। कई अस्थाई पुलिस चैकी बनाई है। 350 से अधिक अतिरिक्त रोडवेज की बसें लगाई गई है तथा सरकार द्वारा यात्रियों को 30 प्रतिशत किराए में छूट दी जा रही है। 

कैलादेवी मेला मजिस्ट्रेट एवं उपखण्ड अधिकारी दीपांशु सागवान ने बताया कि आने वाले पदयात्रियों के लिए करौली से कैलादेवी तक विभिन्न स्थानों पर प्याऊ एवं भोजन के लिए भामाशाहों द्वारा भण्डारे की व्यवस्था की गई है।  मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बडी धर्मशाला में नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है। जिसका दूरभाष नं. 07464-253122 है। मेला मजिस्ट्रेट ने बताया कि कैलादेवी मेले के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं का आना 5 दिन पूर्व से ही प्रारम्भ हो गया था और आज भी भारी संख्या में श्रद्धालू कैलामाता के दरबार में उपस्थित हो रहें है। श्रद्धालू गाते बजाते पैदल चल रहे है। चैत्र मास की नवरात्र के दिनों में माँ के दरबार में श्रद्धालुओं का तांता लगा है। नई दुल्हनें सुहाग का प्रतीक हरी चूड़ियों को पहनकर अपने सुहाग की मातेश्वरी से विनती करती देखी जा सकती हैं तथा माँ के दरबार में महिलाएं माता के जयकारों के साथ नाच कूदकर माँ को रिझाते देखी जा सकती हैं। वही मेले में लगाए गए झूले और मनोरंजन के साधन छोटे बच्चों के लिए आनन्द के लिए तथा डान्स करती शैली में मन को मोह लेने वाले बाल कलाकरों के नृत्य भी देखे जा सकते है। 

कैलादेवी मंदिर का इतिहास

कैलादेवी को कलिया माता भी कहा जाता है। कैलादेवी माता के इतिहास से जुड़ी कई कहानियां मौजूद है। लोगों की मान्यता है कि मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। पुरातन काल में त्रिकूट पर्वत के आसपास का इलाका घने वन से घिरा हुआ था। इस इलाके में नरकासुर नामक आतातायी राक्षस रहता था। नरकासुर ने आसपास के इलाके में काफ़ी आतंक कायम कर रखा था। उसके अत्याचारों से आम जनता दु:खी थी। परेशान जनता ने तब माँ दुर्गा की पूजा की और उन्हें यहाँ अवतरित होकर उनकी रक्षा करने की गुहार की। बताया जाता है कि आम जनता के दुःख निवारण हेतु माँ कैलादेवी ने इस स्थान पर अवतरित होकर नरकासुर का वध किया और अपने भक्तों को भयमुक्त किया। तभी से भक्तगण उन्हें माँ दुर्गा का अवतार मानकर उनकी पूजा करते हुए आ रहे हैं।

वहीं दूसरी मान्यता यह है कि धर्म ग्रंथों के अनुसार सती के अंग जहां-जहां गिरे वहीं एक शक्तिपीठ का उदगम हुआ। उन्हीं शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ कैलादेवी है। प्राचीनकाल में कालीसिन्ध नदी के तट पर बाबा केदागिरी तपस्या किए करते थे यहां के सघन जंगल में स्थित गिरी-कन्दराओं में एक दानव निवास करता था जिसके कारण सन्यासी एवं आमजन परेशान थे। बाबा ने इन दैत्यों से क्षेत्र को मुक्त कराने के लिए घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर माता प्रकट हो गई। बाबा केदारगिरी त्रिकूट पर्वत पर आकर रहने लगे। कुछ समय पश्चात देवी मां कैला ग्राम में प्रकट हुई और उस दानव का कालीसिन्ध नदी के तट पर वध किया। जहां एक बडे पाषाण पर आज भी दानव के पैरों के चिन्ह देखने को मिलते है। इस स्थान को आज भी दानवदह के नाम से जाना जाता है। वहीं इसे योगमाया का मंदिर भी कहा जाता है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव और देवकी को जेल में डालकर जिस कन्या योगमाया का वध कंस ने करना चाहा था, वह योगमाया कैलादेवी के रूप में इस मंदिर में विराजमान है। कैलादेवी का मंदिर सफ़ेद संगमरमर और लाल पत्थरों से निर्मित है। जो देखने में बहुत ही आकर्षक और सुंदर लगता है।

कैलादेवी मंदिर और मेले के अलावा आप करौली के लोकप्रिय दर्शनीय स्थलों की यात्रा भी कर सकते हैं जो इस प्रकार है-

करौली का पैलेस
यदुवंशी शासकों का पूर्व निवास, करौली में यह शानदार महल एक विरासत स्थल है जो उत्कृष्ट वास्तुकला का दावा करता है। यह पैलेस शहर के केंद्र में स्थित है जो अपने ऐतिहासिक आकर्षण के लिए जाना जाता है। 

मदन मोहन जी मंदिर

मदन मोहन जी मंदिर सिटी पैलेस परिसर में स्थित एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। प्रमुख आकर्षणों में से एक मंदिर में विस्तृत अनुष्ठान और भक्ति के साथ की जाने वाली शाम की आरती है। 

श्री महावीरजी जी मंदिर
जैन धर्म के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक, श्री महावीर जी मंदिर हिंडौनसिटी के पास एक दर्शनीय स्थल है जो आध्यात्मिक साधकों के लिए स्वर्ग है। लगभग 200 साल पहले भगवान महावीर की मूर्ति की खुदाई की गई थी जिसके बाद उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की गई थी। 

तिमनगढ़ किला
करौली के करीब एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक किला, तिमनगढ़ किला इतिहास के शौकीनों के लिए एक ज़रूरी जगह है। यह शानदार किला मासलपुर जिले में हिंडौन ब्लॉक के पास स्थित है जो करौली से 42 किमी की दूरी पर स्थित है।

केलादेवी वन्यजीव अभयारण्य
रणथंभौर टाइगर रिजर्व के बफर जोन के भीतर आने वाला, केलादेवी वन्यजीव अभयारण्य वन्यजीव उत्साही और साहसिक चाहने वालों के लिए प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
 

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