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राजस्थान का पान चढ़ा विदेशियों की जुबान, पाकिस्तान और मलेशिया में है खासी डिमांड

खाई के पान बनारस वाला नहीं राजस्थान वाला खुल जाए वाह वाही का ताला। जी हां राजस्थान और भारत ही नहीं विदेशों में भी राजस्थान का ये पान अपनी अनूठी खासियत के कारण अपनी धाक जमा रहा है। ये कमाल किया है, राजस्थान भरतपुर के किसानों ने। जिन्होनें यहां सदियों से होने वाली पान की खेती को अपने प्रयोग से खास बना दिया है। भरतपुर में देसी पान की खेती कई सदियों से होती रही है। जिसकी विदेशों में अच्छी खासी डिमांड है।

पुश्तों से है यही काम 
भरतपुर में तामोली जाति के लोगों
की कई पुश्तें सिर्फ पान उगाने का ही काम करती हैं। यह जाति का सदियों से यही काम है। जिसमें उसे महारत भी हासिल है। यह खेती भरतपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर होती है। यहां बसे गांवों में लोग यह खेती करते हैं। जिनके उगाए हुए पान की काफी डिमांड भी रहती है।  

उमरैण और खरेरी की पहचान है पान
उमरैण गांव ही नहीं बयाना के खरेरी और बागरैन गांव में भी पान की ही खेती लोगों के जीवन यापन का मुख्य स्त्रोत है। यहां स्थित खेड़ा गांव में भी पान की ही खेती की जाती है। यहां खेती करने वाले किसान बताते हैं कि इस पान का स्वाद अन्य जगह से अलग है। यहां पानी की मात्रा अच्छी होने से पान की खेती आसानी से हो जाती है। यही नहीं इस पान का स्वाद भी बहुत मीठा होता है। जो मुंह में रखते ही घुल जाता है। 

बच्चों सा रखते हैं ख्याल
पान की खेती करने वाले किसान इनका अपने बच्चों की तरह पालन पोषण करते हैं। पान की खेती के लिए इसे ज्यादा सर्दी और ज्यादा गर्मी दोनों से बचाना होता है। क्योंकि यह दोनों ही नहीं सह पाती। पान उगाने के लिए जमीन को समतल कर कास के एंगल लगाए जाते हैं। जिसके बाद जमीन की गुड़ाई की जाती है। फिर पान उगाने के लिए सबसे अच्छा माह मार्च आने पर इसकी कलमें लगाई जाती हैं। पहली रोपाई में किसान का करीब डेढ़ लाख का खर्च आता है। 

खेत की होती है छत और दीवारें 
खेत को फूस की एक छत और दीवारों से कवर किया जाता है। जिससे मौसम की मार खेती पर न पड़े। इसके बाद पत्ता आने के लिए करीब तीन महीने का इंतजार करना होता है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए ये किसान आज भी मटकों से इसमें पानी देते हैं और यहां सरसों की खेती के बाद बची खल में छाछ मिलाकर खाद भी बनाई जाती है। जिसे खेत में फैलाया जाता है।

मीठा बनाने का खास तरीका
पान का स्वाद बढ़ाने के लिए किसानों की ओर से एक नायाब तरीका अपनाया गया है। यहां खेती के समय चावल, तिल, सरसों, बाजरा, गेहूं, और उड़द दाल आदि भी खेत में डाली जाती है। जिससे पान में प्राकृतिक मिठास आ जाए। यह पान खाने से न ही तो बीमारियां होती हैं। वहीं यह पान अपने गुणों के कारण शुगर, बीपी के साथ दिल की कई बीमारियों से भी बचाता है। 

तैयार पत्ता जाता है यहां 
जब पत्ता तैयार हो जाता है तो इसके बंडल बनाकर दिल्ली, आगरा, सहारनपुर, अलीगढ़, जयपुर आदि मंडियों में भेजा जाता है। इस पान की डिमांड पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मलेशिया आदि जगहों पर बहुत ज्यादा है।

Ambika Sharma

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