रोशनलाल शर्मा
जयपुर। एक दिन बाद मकर संक्रांति का त्योहार पूरे देश में मनाया जाएगा। इस दिन दान पुण्य भी होगा और पतंगे भी उड़ेंगी लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि मकर संक्रांति का संबंध पतंगबाजी से बिल्कुल नहीं है। पतंग हर सम्प्रदाय बड़ी शिद्दत से उड़ता है जबकि मकर संक्रांति का दान-धर्म सिर्फ हिन्दू समाज में होता है। 
मकर संक्रांति के दिन ही पतंगें क्यों उडऩे लगी और ये परम्परा कब से बनी, कुछ जानकारी नहीं है। हालांकि तमिल रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने सबसे पहली पतंग मकर संक्रांति पर उड़ाई थी, जो इतनी ऊंची गई कि इंद्रलोक तक पहुंच गई। इसी से यह परंपरा शुरू हुई मानी जाती है। पतंग उड़ाना सूर्य उपासना, आभार और नई शुरुआत का प्रतीक है।
जयपुर की पतंगबाजी का इतिहास राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवंत हिस्सा है। यह न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि राजपरिवार की विरासत, साम्प्रदायिक सद्भाव और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति (14 जनवरी) पर जयपुर की छतें रंग-बिरंगी पतंगों से सज जाती हैं, जो शहर की ऐतिहासिक पहचान को जीवंत बनाती हैं।
राजमहल से निकलकर हर हाथ तक पहुंचे पतंग
जयपुर में पतंगबाजी की परंपरा लगभग 150 वर्ष पुरानी है। कुछ इतिहासकार इसे 400 वर्ष पीछे ले जाते हैं। मुख्य रूप से महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय (1835-1880 ई.) ने पतंगबाजी को लोकप्रिय बनाया। वे लखनऊ से इस शौक को जयपुर लाए। लखनऊ अवध की राजधानी था, जहां मुगल काल से पतंगबाजी राजसी मनोरंजन का हिस्सा थी। सवाई राम सिंह इतने शौकीन थे कि उन्होंने लखनऊ से पतंग बनाने वाले कारीगरों, उस्तादों और मांझा (डोर) बनाने वालों को जयपुर में बसाया। उन्होंने एक विशेष बाजार स्थापित किया, जिसे आज भी हांडीपुरा के नाम से जयपुर का बच्चा-बच्चा जानता है और जहां आज भी पतंगों का निर्माण और बिक्री होती है। राजपरिवार की छतों से पतंगें उड़ाई जाती थीं, और कटी पतंगों को लाने के लिए घुड़सवार दौड़ाए जाते थे। जीतने वाले को इनाम मिलता था।
सवाई रामसिंह का शौक आज भी शौक से देखा जाता है
सिटी पैलेस संग्रहालय में आज भी सवाई राम सिंह के विशाल चरखे (स्पूल) और तुक्कल नामक विशेष पतंगें रखी हैं। तुक्कल महीन मसलिन कपड़े से बनती थीं, जिनमें छोटी-छोटी घंटियां बंधी होती थीं, जो हवा में बजती रहतीं। राजपरिवार की महिलाएं भी इस शौक में शामिल होती थीं। उन्होंने एक कारखाना स्थापित किया, जहां पतंगें बनाई जाती थीं। इतिहासकार विंदो जोशी कहते हैं कि सवाई राम सिंह ने अवध से इस परंपरा को अपनाकर इसे एक उत्सव बनाया। पतंगबाजी जयपुर की स्थापना (1727 ई.) के समय से जुड़ी है, जब सवाई जय सिंह द्वितीय ने शहर बसाया, लेकिन राम सिंह ने इसे राजसी स्तर पर बढ़ावा दिया। सवाई माधो सिंह द्वितीय (1880-1925) जो सवाई राम सिंह के उत्तराधिकारी थे उन्होंने भी परंपरा जारी रखी और उनकी पतंग को आकाश में और आगे तक बढ़ाने का काम किया। सवाई मान सिंह द्वितीय (1912-1970) को पोलों के लिए जाना जाता है लेकिन वे भी पतंगबाजी के बड़े शौकीन थे। सिटी पैलेस में आज भी राजपरिवार मकर संक्रांति पर पतंगें उड़ाता है। काइट फेस्ट का आयोजन करता है। इतिहासकार संगीता शर्मा (राजस्थान विश्वविद्यालय) लिखती हैं कि राम सिंह ने पतंगबाजी को राजघराने का हिस्सा बनाया, जो आज भी जारी है।
साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
पतंगबाजी जयपुर में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का प्रतीक है। अधिकांश पतंग और मांझा बनाने वाले मुस्लिम समुदाय से हैं। हांडीपुरा बाजार में 98 प्रतिशत मुस्लिम कारीगर हैं। महिलाएं भी इसमें शामिल हैं, जो घरों में पतंगें बनाती हैं। कागज और बांस से पतंगें, जबकि मांझा कांच-पाउडर से तैयार होता है। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी उत्साह से उड़ाते हैं। छतों पर सामूहिक उत्सव से एकता बढ़ती है।
दान-पुण्य का त्योहार
मकर संक्रांति मुख्य रूप से हिंदू त्योहार है, लेकिन इसमें सामाजिक-धार्मिक सद्भाव है। यह सूर्य की उत्तरायण यात्रा (दक्षिण से उत्तर की ओर) का प्रतीक है, जो 14 जनवरी को मनाया जाता है। सौर कैलेंडर के अनुसार सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है हालांकि लीप ईयर में ये 15 जनवरी को होता है। इस दिन तिल, गुड़, अनाज दान होता है। गंगा, यमुना आदि में डुबकी लगाने श्रद्धालु पहुंचते हैं। तीर्थों में भी स्नान होता है।
