जयपुर। राजस्थान के जालोर से उठी एक आवाज़ ने पूरे देश का ध्यान खींचा। खबर थी महिलाओं के स्मार्टफोन पर रोक! खाप पंचायत का यह फैसला देखते ही देखते राष्ट्रीय बहस बन गया। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों तक, हर जगह सवाल उठे। सवाल उठा कि क्या 21वीं सदी में भी महिलाओं की आजादी पर ऐसे फरमान चलेंगे? और अब, जब दबाव बढ़ा, माहौल बदला और आखिरकार खाप पंचायत को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। आखिर क्या हुआ जालोर में? क्यों लिया गया फैसला और क्यों वापस हुआ? आइए पूरी कहानी समझते हैं।
जालोर जिले की चौधरी समाज सुंधामाता पट्टी की पंचायत ने 21 दिसंबर को गजीपुर गांव में एक बैठक की थी। इस बैठक में 15 गांवों की बहू-बेटियों के लिए बड़ा फैसला सुनाया गया। तय हुआ कि 26 जनवरी से महिलाएं और लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल नहीं करेंगी। सिर्फ की-पैड मोबाइल रखने की अनुमति होगी। पढ़ाई के लिए भी स्मार्टफोन घर की चारदीवारी के अंदर ही इस्तेमाल करने की बात कही गई। शादी-ब्याह, सामाजिक कार्यक्रम या पड़ोस में मोबाइल ले जाने पर भी रोक लगा दी गई।
जैसे ही यह खबर सामने आई, विरोध शुरू हो गया। महिला संगठनों ने इसे महिलाओं के अधिकारों पर हमला बताया। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। अलग-अलग समाचार माध्यमों ने इस मुद्दे को उठाया। विरोध के बाद बुधवार को गजीपुर गांव में पंचों की दोबारा बैठक बुलाई गई। बैठक के बाद पंचायत ने अपने पहले फैसले को रद्द करने का ऐलान कर दिया। पंचों का कहना था कि उनका मकसद महिलाओं को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि बच्चों की चिंता करना था। पंचायत से जुड़े लोगों ने बताया कि महिलाओं ने खुद शिकायत की थी कि बच्चे स्कूल से आने के बाद मोबाइल में ही लगे रहते हैं। न ठीक से खाना खाते हैं, न पढ़ाई करते हैं। आंखों और दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है। इसी चिंता के चलते सुझाव आया था कि महिलाओं के पास स्मार्टफोन न हो। लेकिन जैसे-जैसे विरोध बढ़ा, पंचायत को एहसास हुआ कि समाज में यह फैसला स्वीकार नहीं किया जा रहा। 14 पट्टी के समाज अध्यक्ष ने भी साफ कहा कि समाज को यह निर्णय ठीक नहीं लगा, इसलिए इसे वापस लिया गया है। पंचों ने माना कि फैसला भले ही सही भावना से लिया गया हो, लेकिन लोगों ने इसे गलत तरीके से लिया और इसका संदेश उल्टा गया।
