-12 साल में 1200 मजदूरों ने किया था तैयार, एक मजदूर की आत्महत्या की वजह से कभी नहीं हुई पूजा
रोशनलाल शर्मा
भुवनेश्वर। विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर तीन साल में अपना 900 साल पुराना वैभव पुनः प्राप्त कर लेगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं संरक्षण विभाग यानी एएसआई इस काम के युद्धस्तर पर करने को जुटा है।
दरअसल, मंदिर का मुख्य शिखर लगभग 200–225 फीट ऊंचा था, जो विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों के कारण 16वीं–17वीं शताब्दी के आसपास ढह गया। तब मुख्य मूर्ति हटा ली गई और पूजा बंद हो गई।ब्रिटिश काल में 1903–1904 के दौरान जगमोहन के अंदर नदी की रेत भर दी गई थी और सभी दरवाजे सील कर दिए गए थे। अब 120 से अधिक वर्षों बाद, ASI ने CBRI रुड़की और IIT मद्रास के सहयोग से ज़ीरो-वाइब्रेशन तकनीक से यह रेत धीरे-धीरे निकालने की परियोजना शुरू की है।
रेत हटाने और आंतरिक ढांचे को सुरक्षित करने के लिए करीब 3 साल की समयसीमा तय की गई है। काम पूरा होने के बाद आंतरिक भाग को पर्यटकों के देखने के लिए खोलने की योजना है। इसके बाद इस मंदिर को दुनिया अंदर से भी देख पाएगी।
पूजा अर्चना पर संशय
हालांकि इसके बाद भी यहां पूजा अर्चना शुरू हो पाएगी, इसमें संशय है। दरअसल मंदिर में कोई विग्रह नहीं है। एंशिएंट मॉन्यूमेंट्स एंड आर्कियोलॉजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट के तहत जिन संरक्षित स्मारकों में अधिग्रहण के समय पूजा नहीं होती थी, उन्हें “गैर-जीवंत” माना जाता है और वहां नई धार्मिक परंपराएं शुरू नहीं की जाती। इसके अलावा, मुख्य गर्भगृह का ढांचा और मुख्य विग्रह सदियों पहले ही नष्ट हो चुके हैं।
चुंबकीय शक्ति पर टिका था ढांचा
मंदिर के निर्माण के समय पत्थरों को जमा कर तराशा गया था। आज भी वो मूर्तियां सुरक्षित है। साथ में लोहा डाला गया। आसपास 5 अन्य मंदिर बने जिन्हें मैगनेट के जरिए मुख्य सूर्य मंदिर के साथ बैलेंस किया गया। जब कोणार्क मंदिर ढहाया गया तब मैग्नेटिक बैलेंस टूटने से बाकी के पांचों मंदिर भी खंडहर हो गए।
क्या काम कर रहा है एएसआई
दरअसल, भीतर भरी हुई रेत 12 से 17 फीट तक नीचे धंस गई थी और पत्थर चटकने का खतरा था। मंदिर के जगमोहन की दीवार पर लगभग 80 फीट की ऊंचाई पर करीब 4 बाई 4 का छेद बनाकर रेत निकालने का रास्ता तैयार किया गया है। रेत निकलने के बाद खाली हुए स्थान में पत्थरों को सहारा देने के लिए हल्के और मजबूत स्टेनलेस स्टील के बीम व आधुनिक सपोर्ट लगाए जाएंगे, ताकि मंदिर बिना रेत के सुरक्षित खड़ा रह सके।
जानिए कोणार्क मंदिर का इतिहास
मंदिर 13वीं में 1238 में बनना शुरू हुआ। राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा 1200 मजदूरों ने 12 साल में पूरा किया।
स्थापत्य शैली का सबसे बड़ा और पुराना उदाहरण
कलिंग शैली की वास्तुकला का शिखर है। इसे 24 नक्काशीदार पहियों और 7 घोड़ों वाले एक विशाल सूर्य रथ के रूप में तराशा गया था, जिसके पहिये धूपघड़ी का काम करते हैं। यूनेस्को ने 1984 में इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।
तीन साल में अपने 900 साल पुराने वैभव में लौटेगा कोणार्क का सूर्य मंदिर
