रोशनलाल शर्मा
भुवनेश्वर। उड़ीसा जीडीपी के मामले में चाहे देश में विकसित राज्यों से कहीं पीछे हो लेकिन परम्परागत कलाओं के संरक्षण में आज भी उड़ीसा देश के उन्नत राज्यों में शामिल हैं जहां एक गांव को यूनेस्को जैसी विश्वस्तरीय संस्था ने वर्ल्ड हेरिटेज में स्थान दिया है।
रघुराजपुरा उड़ीसा की जगन्नाथपुरी से करीब 13 किमी की दूरी पर है। गांव की विशेषता ये है कि यहां हर तीसरा घर करीब ढाई सौ सालों पुरानी पट चित्र शैली की पेंटिग के लिए दुनिया के नक्शे पर बहुत इज्जत के साथ देखा जाता है।
पुरी के समुद्र तट से महज पांच किमी दूरी पर स्थित इस गांव में घुसते ही पहला घर इस मशहूर परम्परागत चित्र शैली के कलाकार विजयकुमार बारीकी का है। दरअसल घर नहीं ये अपने आप में एक चित्र म्यूजियम है। बारीकी 2017 में राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित चित्रकार हैं। वे बताते हैं कि उनकी 40 पिढियां जगन्नाथ भगवान की सेवा में गुजर गई। पट चित्रकला का उद्भव दरअसल भगवान जगन्नाथ की मंदिर की स्थापना से हुआ है।
इसलिए जुड़ा इस कला का भगवान जगन्नाथ से नाम
ज्येष्ठ मास की देवस्नान पूर्णिमा के बाद जब भगवान जगन्नाथ बीमार माने जाते हैं, तब मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। ऐसे में दर्शन के लिए मंदिर में भगवान के पटचित्र जिन्हें ‘पट्ट-दीर्घ’ या ‘अनसॅक पट’ कहा जाता है, स्थापित किए जाते हैं। पटचित्र में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, उनकी विभिन्न लीलाओं, दशावतार और कृष्ण कथाओं का अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर चित्रण किया जाता है। पटचित्र में देवताओं का रंग-रूप और उनके चेहरे की बनावट पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों से मिलती-जुलती होती है। रघुराजपुर गाँव इस कला का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां के 40 पीढ़ियों से इस परंपरा को भगवान जगन्नाथ की सेवा के रूप में जीवित रखे हुए हैं।
इसलिए नाम पड़ा पट चित्र
सूती कपड़े को इमली के बीजों के लेप और खड़िया मिट्टी के मिश्रण से कई परतों में सख्त बनाया जाता है। इसमें सफेद रंग के लिए समुद्र के शंख का चूर्ण काम में लिया जाता है। सूखने के बाद इसे चिकने पत्थरों या सीपियों से रगड़कर चमकीला और चिकना कैनवास बनाया जाता है। काला रंग दीपक के काजल या जले हुए नारियल के छिलके से तैयार किया जाता है। वहीं पीला हरिताल पत्थर से और लाल रंग गेरु से तैयार होता है। हरा रंग पत्तियों और हरी जड़ी-बूटियों से बनता है। जबकि रेखाएं खींचने के लिए गिलहरी या चूहे के बालों से बने बारीक ब्रश का प्रयोग किया जाता है।
कला को संरक्षण की दरकार
इसी तरह की कला पीपीली गांव में भी देखने को मिलती है। इस हस्तकला को खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जियो टैगिंग दी है।
चालीस पीढ़ी से जगन्नाथ भगवान की सेवा में चित्रकारी
