रोशनलाल शर्मा
भुवनेश्वर। पूरी दुनिया में खबर ये फैली है कि भगवान जगन्नाथ के विग्रह में श्रीकृष्ण का हृदय धड़कता है और हर 12 से 19 साल के दौरान एक विशेष मुहुर्त में जगन्नाथपुरी में रात को अंधेरा करके इस हृदय यानि ब्रह्म पदार्थ को ट्रांसफर किया जाता है। ये एक फेक न्यूज है और इसका खंडन भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई लिंगराज मंदिर से आया है।
लिंगराज मंदिर में अपनी सेवाएं दे रहे इतिहासकार प्रफुल्ल पंडित ने बताया, दरअसल कलियुग के अन्त में जब श्रीकृष्ण ने अपनी देह त्यागी तो पांडवों ने उनका अन्तिम संस्कार किया। उस समय उनकी देह तो भस्म हो गई लेकिन उनका वह नाभि कमल बच गया। जिसे उनके पौत्र ने समुंद्र में बहा दिया। कालान्तर में भगवान कृष्ण द्वारा एक राजा को स्वप्न में दर्शन देकर समुद्र में मौजूद उस दिव्य अवशेष को बाहर निकालकर उसकी प्रतिष्ठा करने का दिया। आगे विश्वकर्मा द्वारा दिव्य स्वरूप के निर्माण की कथा जुड़ती है।
हरि और हर की पूजा एक साथ सिर्फ इसी मंदिर में
‘लिंगराज’ का अर्थ ही है—लिंगों के राजा। लेकिन यहां धार्मिक परंपरा केवल शिव के एकांगी स्वरूप तक सीमित नहीं रहती। मंदिर के आराध्य को हरिहर के रूप में भी देखा जाता है। हर’ भगवान शिव का नाम है और ‘हरि’ भगवान विष्णु का। इस तरह हरिहर की अवधारणा दोनों प्रमुख हिंदू परंपराओं के मिलन का प्रतीक बन जाती है। सबसे खास बातें की मंदिर की ध्वजा पर भगवान श्री राम के धनुष की आकृति लहराती है। यहां भगवान शिव अपने शरीर और भगवान हरि अपने सालिग्राम स्वरूप के साथ उपस्थित हैं। ओडिशा पर्यटन विभाग भी लिंगराज मंदिर को शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण बताता है। मंदिर के इतिहास में समय के साथ वैष्णव तत्वों का समावेश हुआ और इसी कारण हरिहर स्वरूप की धार्मिक व्याख्या को विशेष महत्व मिला। एक तरफ दस्तावेजों में दर्ज इतिहास है और दूसरी तरफ पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक स्मृतियां।
जगन्नाथ पुरी से लिंगराज का धार्मिक रिश्ता
लिंगराज मंदिर की चर्चा भगवान जगन्नाथ की परंपरा के बिना अधूरी मानी जाती है। लिंगराज को भगवान जगन्नाथ के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि पुरी की मुख्य परंपरा में बलभद्र को भगवान जगन्नाथ का बड़ा भाई माना जाता है।
पूजा और परंपरा
लिंगराज मंदिर आज भी जीवंत धार्मिक स्थल है। यहां पूजा-अर्चना निर्धारित परंपराओं और सेवायत व्यवस्था के अनुसार होती है। मंदिर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश की अनुमति नहीं है। ऐसे श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए बाहर से मंदिर के दर्शन की व्यवस्था है।
इतिहास, स्थापत्य और आस्था—तीनों का संगम
भुवनेश्वर का लिंगराज मंदीर कलिंग स्थापत्य शैली का सर्वोत्तम और सबसे भव्य प्रतीक माना जाता है। यह ओडिशा के सबसे प्राचीन और विशालतम मंदिरों में से एक है। वर्तमान भव्य संरचना 11वीं शताब्दी की है, लेकिन संस्कृत ग्रंथों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार इस स्थल पर 6ठी–7वीं शताब्दी (शैलेंद्र व भौम-कर राजवंशों के समय) से ही पूजा-अर्चना के प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजवंश के काल में हुआ था इतिहासकार मानते हैं कि मंदिर का मुख्य निर्माण सोमवंशी राजा ययाति द्वितीय के समय (लगभग 1025–1040 ईस्वी) शुरू हुआ था। इसे उनके उत्तराधिकारी राजा ललाटेंदु केसरी (उद्योत केसरी) ने 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लगभग 1065 ईस्वी) में पूरा कराया।
जगन्नाथ भगवान के विग्रह में उनका हृदय नहीं, नाभि कमल
पूरी की विश्व प्रसिद्ध फेक न्यूज का खंडन बड़े भ्राता के मंदिर लिंगराज आया
